देहरादून (उत्तराखंड) [भारत), 13 अक्टूबर : उत्तराखंड सरकार ने मंगलवार को कहा कि उसने चमोली जिले के वसुंधरा ताल में एक अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने का पहला फेज़ पूरा कर लिया है, ताकि ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के संभावित खतरों की मॉनिटरिंग को मज़बूत किया जा सके।
सिस्टम को इंस्टॉल करने के लिए तैनात साइंटिफिक और टेक्निकल टीम ने मुश्किल मौसम और ऊंचे हिमालयी इलाके में मुश्किल इलाके के बावजूद अपना मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया और वापस लौट आई। टीम ने ग्लेशियल झील में और उसके आस-पास कई एडवांस्ड सेंसर लगाए।
डिज़ास्टर मैनेजमेंट और रिहैबिलिटेशन के सेक्रेटरी विनोद कुमार सुमन ने मंगलवार को उत्तराखंड स्टेट डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (USDMA) में टीम का स्वागत किया।
राज्य सरकार के अनुसार, यह पहली बार है जब उत्तराखंड में किसी ग्लेशियल झील पर अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाया गया है। उम्मीद है कि इस सिस्टम से संभावित खतरों की साइंटिफिक मॉनिटरिंग मज़बूत होगी और कमज़ोर इलाकों के लिए समय पर चेतावनी देने में मदद मिलेगी।
चीफ सेक्रेटरी आनंद बर्धन ने 29 सितंबर को टीम को हरी झंडी दिखाई थी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के लिए ग्लेशियल झीलों से होने वाले संभावित खतरों की पहले से पहचान करना बहुत ज़रूरी है।
उन्होंने कहा कि राज्य मॉडर्न टेक्नोलॉजी, साइंटिफिक रिसर्च और इंस्टीट्यूशनल कोऑर्डिनेशन के ज़रिए अपने डिज़ास्टर मैनेजमेंट सिस्टम को मज़बूत कर रहा है। उन्होंने कहा कि वसुंधरा ताल में यह इंस्टॉलेशन ऊंचे हिमालयी इलाके में खतरों की मॉनिटरिंग, समय पर चेतावनी जारी करने और कमज़ोर इलाकों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को बेहतर बनाने की दिशा में एक कदम है।
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि राज्य सरकार वैज्ञानिक संस्थानों के साथ मिलकर आपदा प्रबंधन में आधुनिक टेक्नोलॉजी अपनाने को बढ़ावा दे रही है।
यह पहल मुख्यमंत्री धामी और आपदा प्रबंधन और पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक के निर्देश पर की गई।

